प्रेम की बीस कविताएं और निराशा का एक गीतः पाब्लो नेरूदा

लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है

12 जुलाई 1904 में चिले के एक छोटे से दक्षिणी पर्राल में एक साधारण परिवार में रिकार्दो नेफताली रेय्यस का जन्म हुआ जो आगे चलकर जनकवि पाब्लो नेरूदा के नाम से जाना गया। नेरूदा का बचपन तेमूको शहर में बीता। सोलह साल की उम्र में वह चिले की राजधानी सांतियागो में उच्च शिक्षा के लिए पहुंचे। वहां फा्रंसीसी साहित्य की पढाई शुरू करते समय वह कई कवितायें लिख चुके थे लेकिन पहली बार प्रसिद्धी उन्हें 1924 मे 'प्रेम की बीस कविताएं और निराशा का एक गीत' से मिली।

बीसवीं सदी के पहले दो दशक तो यूरोपीय और लैटनी अमरीकी काव्य में आधुनिकतावाद का दौर था लेकिन नेरूदा उस दौर के प्रयोगात्मक लेखन से दूर पारंपरिक भाषा में ही गंभीर और गहरे अर्थो से लैस कविता लिखते रहे। उन्होनें कुछ हद तक आधुनिकावाद को भी अपनाया लेकिन उनकी रचनाओं में महत्वपूर्ण हमेशा बिंबात्मकता ही रही। 1927 में बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से मजबूर नेरूदा राजनयिक सेवा का हिस्सा बन गए। पांच साल तक वह रंगून, जावा और कोलंबो में रर्हे इसी दौरान उनकी रेसिदेन्सिया एन ना तियेरा प्रकाशित हुई। 1936 में स्पेनी गृह युद्ध के दौरान वह मेड्रिड भेजे गए और वहां उनकी मित्रता राजनैतिक रूप से प्रतिबद्ध और साहित्य में सक्रिय कवियों से हुई। वह लोर्का, आलबेर्ती, माचादो के अत्यंत करीब आए। काउंसिल के रूप में उन्होने अनेक रिपब्लिकन और जनवादीयों के पक्ष में आवाज उठायी। और अंततः नौकरी से हाथ धोना पड़ा। स्पेन में अपने अनुभव में विश्वास के आधार पर क्रोध एंव निंदा से भरी कविता संग्रह तैयार किया (एस्पान्या एन मी कोरासोन स्पेन मेरे हृदय में।)

लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है

 

1950 में उनका महानतम कविता संग्रह कांतो खेनेराल सामान्य गीत प्रकाशीत हुआ जो उन्होनें 12 सालों मे तैयार किया था। इस दौरान नेरूदा अपने देश चिले में संसद के सदस्य थे। उनकी सक्रियता और लेखन सत्ताधारी पक्ष को रास नहीं आा रहा थी और नेरूदा को पहले भूमिगत होना पउ़ा और फिर देश छोड़कर निर्वासित भी। इस दौरान नेरूदा गरीब मजदूरो और किसानों के घरों में, खेतों और खदानों में छिपे। यही अनुभव 'कातों खेनेराल' का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर कविता के रूप मे उजागर हुआ। 1962 में 'वेरसोस देल कापितान' (कप्तान के छंद) नामक संग्रह प्रकाशित हुआ। यह नेरूदा ने अपनी तीसरी पत्नि मातिल्दे उरूतिया को समर्पित किया। प्रेमगीत होने के बावजूद कवि नेरूदा अपनी पत्नि को प्यार एंव कामना की मूर्ति के रूप में पेश नहीं करते बल्कि अपने प्रेम को आम जीवन से जोड़ते हैं और उनकी पत्नि संघर्षो में? लक्ष्य तक पहुंचने वाले कठिन रास्तों में साथ चलने वाली संगनी है। इसी साल प्रकाशति संकलन प्लेनोस पोदेरेस (पूर्णत सशक्त) में उस तनाव की अनूभूति होती है जो कवि और उसकी रचना के बीच होता है।

1971 में पाब्लो नेरूदा को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। समारोह में दिए गये अपने भाषण में उन्होनें कहा था- '' मैने किसी किताब में कविता रचना की विधी नहीं पढी है और मैं भी कोई विधी, शैली या सलाह नए कवियों के लिए छोड़कर नहीं जाने वाला हुं---- लेकिन जब मै किसी घटनाक्रम में उलझने के कारण अपने देश की दक्षिणी सीमा को पार करने के लिए मुश्किल रास्तों से गुजर रहा था तभी मुझे कविता के सृजन के लिए जरूरी सामग्री मिली। वहां मुझे हृदय और मिट्टी का अनोखा मिश्रण मिला।''

23 सिंतबर 1972 को पाब्लो नेरूदा का देहांत हो गया। पाब्लो नेरूदा न केवल अपने देश के बल्कि पूरे लैटिन अमेरिकी महाद्वीप की जनता के प्रतिनिधी कवि थे। सीधे व सरल व्यक्तित्व के धनी कवि? राजनीतिज्ञ, समाजसुधारक पाब्लो नेरूदा की शक्तिशाली कविता और सक्रिय जीवन ने बींसवी सदी के बाद हमेशा के लिए छाप दुनिया पर छोड़ दी।

साभारः ये लेख पाब्लो नेरूदा के एक किताब से ली गयी है