लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है

लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है

महान रूसी साहित्यकार लेव निकोलायेविच तोलस्तोय 1828-1910 सारे विश्व में अपने उपन्यासों नाटकों तथा कहानियों के लिए जाने जाते है जो विश्व की बहुत सी भाषाओं में प्रकाशित होते हैं और समस्त मानव संस्कृति की अमर निधि माने जाते हैं । महान साहित्यकार की कलात्मक रचनाएं कोई डेढ़ सौ वर्षों से मानवजाति को उद्वेलित करती आ रही हैं। इसमें आश्र्चय की कोई बात है भी नहीं। तोलस्तोय ने अपनी रचनाओं में शाश्वत, सबसे गूढ़ और मानव जीवन को सभी कालों में झकझोरनेवाले प्रश्न उठायें थें। रूपविधान की दृष्टि से अत्यंत परिष्कृत और अंतर्वस्तु की दृष्टि से बहुत समृद्ध लेव तोलस्तोय की रचनाएं आज भी हमारी कल्पना पर छाकर हमें अपने अस्तित्व के बारे मे, आज के जीवन में मनुष्य के प्रयोजन के बारे में सोचने को विवश करती है। किंतु विश्व साहित्य में यह तथ्य अपेक्षाकृत कम ज्ञात है कि लेव तोलस्तोय एक बड़े शिक्षा-सिद्धांतकार और बच्चों के शिक्षण तथा पालन के क्षेत्र में नये विचारोे, नयी पद्धतियों के प्रवर्तक भी थे। गहन चिंतन, जीवनीय प्रेक्षणों और अथक सृजनात्मक श्रम ने महान विचारक को गंभीर शिक्षाशास्त्रीय निष्कर्षो पर पहुंचाया था।

तोलस्तोय के कृतित्व के कतिपय अध्येताओं का सोचना था की उनका शैक्षिक कार्यकलाप एक अमीर रूसी जमींदार के अल्पकालीन शौक या कहें तो ’’सनक’’ के अलावा और कुछ न था। मगर इस तरह के विचार वास्मविकता से तनिक भी मेल नहीं खाते। उन्होने अपने जीवन के बहुत वर्ष शिक्षा और पालन के क्षेत्र में अथक तलाशो में व्यतीत किये थे जैसे उनकी साहित्यक रचनाएं मानवजाति के कलात्मक विकास में उत्कर्ष की परिचायक थीं वैसे ही उनकी शिक्षा-शास्त्रीय रचनाएं पालन, शिक्षा और शिक्षण के विज्ञान में अनुपम योग दान का प्रतीक बनीं। लेव तोलस्तोय की शिक्षाशास्त्रीय रचनाओं के संबध में यह सदा याद रखा जाना चाहिए कि वह अपनी इन रचनाओं को साहित्यिक रचनाओं से अधिक मूल्यवान मानते थे और यह बात उन्होनें बहुत बार कही थी। वह किस हद तक सही थे, इसका निर्णय आनेवाली पीढ़ियो को करना है। किंतु एक बात निर्विवाद हैः उनके साहित्यिक और शिक्षाशास्त्रीय कृतित्व आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैंै। मनुष्य के मानस और आत्मा की गति में पैठ पाने की अपनी अनुपम योग्यता की बदौलत तोलस्तोय शैक्षिक प्रक्रियाओं का बहुमुखी अध्ययन कर सके और मनुष्य के स्वतंत्र तथा सर्वांगीण विकास के नये तरीके तथा साधन बता सके।

लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है

 

तोलस्तोय के लेंखो, पत्रों तथा डायरियों और उनके बारे में समकालीनों के संस्मरणों का अध्ययन करके हमारा यह विश्वास और दृ़़ढ़ बन जाता है कि तोलस्तोय रूस तथा विश्व साहित्य के दिग्गज ही नहीं थे, बल्कि वह रूस और विदेशो की शिक्षाप्रणालियों के दूरदर्शी अध्येता भी थे। एक देहाती स्कूल के, जिसकी स्थापना उन्होनें स्वंय की थी, अध्यापक के रूप में उनका सारा व्यावहारिक कार्यकलाप उनकी सैद्धांतिक तलाशो का प्रमाण प्रस्तुत करता था।

शिक्षाशास्त्र के क्षेत्र में लेव तोलस्तोय के प्रथम कदमों के बारे में दुर्भाग्यवश अधिक दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। किंतु इतना असंबिग्ध है कि सार्वजनिक शिक्षा को बदलने तथा सुधारने की आकांक्षा उनके मन में युवावस्था में ही पैदा हो गयी थी। इसका पता उनकी एक आरंभिक, काफी हद तक आत्मकथात्मक कहानी ’एक जमींदार की भोर’ से चलता है। इस कहानी का मुख्य पात्र विश्वविद्याालय का विद्यार्थी नेख्ल्यूदोव है। वह अपनी विश्वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देता है क्योंकि उसे लगता है कि उसके जीवन की राह उसके भावी कार्यकलाप की दिशा कुछ और ही होनी चाहिए। वह इस निष्कर्ष पी पहुंचता है की आदमी के जीवन का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह जिन लोगों के बीच रहता है, उनका भला करे। उसकी मान्यता बनती है की व्यक्तिगत खुशहाली तब तक असंभव है जब तक रूस का सबसे बहुसंख्यक वर्ग-किसान समुदाय-अज्ञान के अंधकार मे डुबा हुआ है। ’एक जमींदार की भोर’ का नायक नेख्ल्यूदोव मानता है कि किसानो के बच्चो की शिक्षा और नैतिक विकास हर शिक्षित व्यक्ति के लिए सर्वोपरि कार्य होना चाहिए। परिणामस्वरूप, वह अपना जीवन इस साधारण, संवेदनशील तथा अभी भ्रष्ट न हुए वर्ग के लिए काम करने, उसे गरीबी से छुटकारा दिलाने, सुख-संतोष प्रदान करने, शिक्षित बनाने, अज्ञान और अंधविश्वास से जनित दोषों को दूर करने, उसमें नैतिक गुणो का विकास करने, नेकी से प्रेम करना सिखाने के ध्येय को समर्पित करने का निर्णय करता है। नेख्ल्यूदोव ने जब ये योजनाएं बनायी थी, उसकी आयु तब 19 वर्ष थी। लगभग इसी उम्र मे 40 के दशक के अंत मे स्वयं लेखक ने भी अपने गांव यास्नाया पोल्याना में स्कूल की स्थापना की थी।

स्कूल चलाने का प्रयोग अधिक समय जारी ना रहा। 1851 के वंसत में लेव तोलस्तोय को सैनिक सेवा के लिए चले जाना पड़ा। आंरभ में वह काकेशिया में रहे और फिर सेवास्तोपोल की रक्षा में भाग लिया। यहां की सामरिक कार्रवाइयां ’सेवास्तोपोल की कहानियां’ का आधार बनीं, जिन्होने एक प्रतिभाशाली लेखक के रूप में तोलस्तोय का सिक्का जमा दिया और उन्हें साहित्यकारों की पंक्ति में सम्मानित स्थान दिला दिया। किंतु इस सार्विक मान्यता और ख्याति के बावजूद वह अपने कैशोर्य काल में बने विश्वासो और संकल्पो से डिगे नही। सेना से सेवानिवृत होते ही उन्होने यास्नाया पोल्याना में शिक्षा का कार्य पुनः आरंभ कर दिया

लेव तोलस्तोय के सृजन जीवन के आरंभ में उनके साहित्यिक और शैक्षिक कार्यकलाप के बीच वैसी खाई न थी, जैसी तोलस्तोय विषयक कुछ साहित्यमीमांसीय रचनाओं के लेखक बताते हैं। इतना ही याद करना काफी होगा की तत्कालीन रूस के प्रगतिशील शिक्षाशास्त्रियों ने यह मांग करने की कोशिश की थी की अगर शिक्षाशास्त्र मनुष्य को सभी पहलुओं से जानना होगा। शिक्षाशास्त्र के इस आधारभूत सिद्धांत की छाप लेव तोलस्तोय की 1852-57 में लिखी गयी रचनात्रया-’बाल्यावस्था’, ’कैशोर्य’ और ’नवयौवन’- में सर्वत्र देखी जा सकती है। इन लघु उपन्यासों में लेखक ने अदृभूत कौशल और मनोवैज्ञानिक प्रत्यायकता के साथ और क्रमबद्ध ढंग से बच्चे, किशोर और नवयुवक के अंतर्जगत का, उसकी जटिल, प्रायः औरों से छिपी हुई, सूक्ष्म संवेदनाओं का उदृघाटन किया। इन्हीं रचनाओं में तोलस्तोय ने बच्चे के व्यक्तित्व की परवाह तथा इज्जत करने से संबंधित अपने मानवतावादी विचार को पूर्ण स्पष्टता के साथ प्रतिपादित किया था। यह विचार बाद मे अध्यापक के तौर पर लेव तोलस्तोय के सारे कार्य कलाप का मूलमंत्र बना रहा।

लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है

 

स्कूल में काम करते हुए लेव तोलस्तोय ने बहुत शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि बच्चों को सिखाना आसान और मामूली काम नहीं है, कि इसके लिए कैसी भी शिक्षा-यहां तक कि विश्वविद्यालयी शिक्षा भी-पर्याप्त नही होगी, क्योंकि सफल अघ्यापक होने के लिए विशेष प्रशिक्षण आवश्यक है। जब उन्हें पहले परिणामों से संतोष नहीं हुआ तो वह शिक्षाशास्त्रीय साहित्य की ओर उन्मुख हुए और कतिपय पश्चिमी यूरोपीय देशों के अग्रणी शिक्षाशास्त्रीयों तथा विद्वानो से संपर्क करने लगे। 1857 में तोलस्तोय अपनी प्रथम विदेश यात्रा पर रवाना हुए और जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड तथा इटली का दौरा किया। वहां उन्होनें पश्चिमी यूरोपीय संस्कृति, साहित्य, कला और रंगमंच का तो अध्ययन किया ही, साथ ही इन देशों की शिक्षा संस्थाओं एंव दनके कार्य का प्रत्यक्ष परिचय भी पाया।

लेव तोलस्तोय का महान शैक्षिक कार्यकलाप 31 वर्ष की अवस्था मे, 1859 मे आरंभ हुआ और कुछ अंतरालो के साथ उनके लगभग अंतिम दिनों तक जारी रहा। प्रथम दृष्टि में लग सकता है कि शिक्षा के क्षेत्र में उनके व्यावहारिक कदमों का कोई खास महत्व न थाः उनके स्कूली कार्यकलाप का पैमाना छोटा था और उस जमाने के लिए वह लाक्षणिक भी न था। फिर भी अगर हम तोलस्तोय की शिक्षाशास्त्रीय मान्यताओं पर 19वीं सदी के मध्य के रूस की सामान्य स्थिति के संदर्भ में गौर करें, तो इस कार्यकलाप का वास्तविक महत्व उजागर हो जायेगा। लेव तोलस्तोय के विश्वदृष्टिकोण और उनकी शिक्षा तथा पालन संबधी धारणाओं का निर्माण एक ऐसे युग में हुआ था जो रूस राजनीतिक और आर्थिक जीवन में एक महत्वपूर्ण चरण था। देश उस समय सामंती राजतंत्र से बुर्जुआ राजतंत्र की ओर संक्रमण कर रहा था। गत शति के सातवें दशक से पहले रूस औद्योगिक विकास के मामले में बहुत सारे यूरोपीय राज्यों की तुलना में काफी अधिक पिछड़ा हुआ था। उत्पादक शक्तियों के विकास में, पूंजीवाद के मार्ग पर आगे बढ़ने में मुख्य बाधा भूदास प्रथा थी

भूदास प्रथा के मुताबिक उस काल के किसान जमींदारों की संपत्ति थे, उनकी जमीन छोड़कर अन्यत्र नहीं जा सकते थे, पूर्ण रूप से उनपर आश्रित थे और प्रशासन तथा न्याय से संबधित उनके आदेश मानने को विवश थे। किसानो की असह स्थिति के कारण देश में जब-तब किसान विद्रोह भड़कते रहते थे, जिनमें भूदास प्रथा के खात्मे की मांग की जाती थी। इन विद्रोहों तथा जनवादी शक्तियों के आह्वानो से डरकर और अर्थव्यवस्था के जर्जर रूपों को आगे भी बनाये रखने मे अपने को असर्मथ पाकर जारशाही सरकार 1861 में भूदास प्रथा की समाप्ति की घोषणा करने को बाध्य हुई। किंतु इसमें भी मुख्य रूप से सामंतो के हितों को ध्यान में रखा गया था। भूमि पर जमींदारो का स्वामित्व बना रहा। किंसानो के लिए जमींदारो से भूमि पाने के लिए उसका मुआवजा देना अनिवार्य था। इससे पहले भूमि के एवज में उन्हें जमींदारो के यहां तरह-तरह की बेगारें करनी पड़ती थी और साथ ही लगान भी देना पड़ता था

भूदास प्रथा के उन्मूलन के बाद उत्पन्न स्थिति का वर्णन करते हुए ब्ला0 इ0 लेनिन ने लिखा था ’’1861 के बाद पुराना पितृसत्तात्मक रूस विश्व पूंजीवदी के प्रभाव से बड़ी तेजी सेढहने लगा। किसानो को भरपेट खाना नही मिल रहा था वे पहले से भी बड़ी तादाद में मर रहे थे तबाह हो रहे थे जमीन छोड़कर शहर भाग रहे थे। उजड़े हुए किसानो के ’सस्ते श्रम’ की बदौलत बड़ी तेजी से रेलमार्गो, फैक्टरियो और कारखानो का निर्माण हो रहा था। रूस में बड़ी वित्तिय पूंजी , बड़े पैमाने का व्यापार तथा उद्योग बढ़ रहे थे।’’

पुराने रूस के सभी पुराने आधारों का यह द्रुत, भीषण और तीव्र ध्वसं ही कलाकार तोलस्तोय की रचनाओं और विचारक तोलस्तोय की मान्यताओं में व्यक्त हुआ था। लेव तोलस्तोय के विश्वदृष्टिकोण के बारे में बहुत पुस्तकें और लेख लिखे गये थे। किंतु उनका पहला सच्चा वैज्ञानिक विश्लेषण विश्व सर्वहारा के नेता ला0 इ0 लेनिन ने ही किया। तोलस्तोय के बारे में लेनिन के लेख इस प्रतिभाशाली रूसी लेखक के लिए अगाध प्रेम की भावना का प्रदर्शन करते है। लेनिन लिखते है कि तोलस्तोय ने ’’अत्यंत सशक्त ढंग से, आत्मविश्वास और ईमानदारी के साथ ऐसे बहुत सारे सवाल उठाये, जो वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था की बुनियादी विशेषताओं से संबंध रखते है।