नागालैंड के अंतिम हेडहंर्टस और उनकी गुप्त संस्कृति

नागालैंड के अंतिम हेडहंर्टस और उनकी गुप्त संस्कृति

नागालैंड संस्कृति और गुप्त रहस्यो से भरा एक अलग दुनिया मानो ये जैसे बाहर के दुनिया के लिये एक विशाल चित्रण हो, नागाओ की एक अद्वितीय पहचान है कि उनकी जीवनशैली, भोजन और संस्कृति सबसे जुदा है। नागालैंड राज्य में 35 से अधिक मौजूदा जनजातियां हैं इनमे से कुछ प्रमुख रूप से मणिपुर और बर्मा में मौजूद हैं। मुख्यधारा में मुख्यतः तीन जनजातियां हैं सुमी या सेमी (अधिकतर दीमापुर क्षेत्र में वर्चस्व), साँप खाने के लिए अंगामी जनजाति ज्यादातर कोहिमा गांवों और प्रसिद्ध कोंनाक तक ही सीमित हैं, अन्य प्रमुख जनजाति जैसे एओ, चांग, लोथा, माओ, जमे और अन्य मणिपुर और बर्मा में फैले हुए हैं।

1930 तक, नागालैंड में अधिकांश दूरदराज के इलाकें पूरी तरह से बाहरी लोगो के लिये अंजान था, यहां तक कि मानचित्रों में भी इसका उल्लेख नहीं किया गया था। हेडहंर्टस (यानि इंसानो के सर को काटने वाला) मुख्य जनजाति थे ऐसा कहानी प्रचलीत है की सभी नागा सिरहृक्ष वंश के माध्यम से आए। वे दूर गांवों में रहने लगे और प्राकृतिक बाड ने उन्हे़ जंगलों और तेज नदियों ने उनकी रक्षा की। वे अपने दुश्मनों से लड़े भी थे जो पड़ोसी गांव थे। सिर का शिकार एक संस्कृति की तरह थी। नागा महिलाओं उन पुरुषों का मजाक उड़ाती थी जिसके पास चेहरे या छाती पर टैटू नही होते थे क्योंकि टैटू होना एक पुरूषत्व को दिखलाता था की उस शख्स ने अपने दुश्मन का सर काटा है। और इस बात पर भी निर्भर करता था की कबीले के पुरूष की शादी तभी हो सकती थी जबतक की वो एक सर ना ले आये क्योंकि ऐसा करने पर उसे कबीले की सुंदर महिला चुनने का अवसर देती थी।

नागालैंड के अंतिम हेडहंर्टस और उनकी गुप्त संस्कृति

हांलाकि ये बात कहीं नही लिखी गयी की इन जनजातियो ने ये शिकार कब से शुरू किया। किंतु इनके विषय मे आम लोगो को तब पता चला जब उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दिनों में अंग्रेज बड़ी संख्या में वहा पहुंचे।

हेड-हंटिंग एक सांस्कृतिक घटना ही नहीं बल्कि एक शुद्ध विवादित विषय था। शिकारी को सिर काटने के कौशल के लिए प्रशिक्षित किया गया जाता था और शिकारी द्वारा सर को गाँवों और औपचारिक नृत्य के लिए लाया जाता था। वो खोपड़ी का इस्तेमाल अपने घरों को सजाने के लिए किया करते थे उन खोपड़ीयो में न केवल जानवरों बल्कि पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सर भी शामिल होते थे। इन खोपलों मे चावल के बीयर को भरकर उन्हे पीया जाता था यह अनुष्ठान गांव के जीवन का केंद्रीय केंद्र था, ताकि आत्माएं गांव में फिर से आ सकें, ताकत और जीवन शक्ति दे।

आज हेड-हंटिंग लगभग विलुप्त हो चुके है इसके कई कारण है जिसमे नागाओ के बीच भूमि विवाद तथा सरकारो द्वारा जंगलो की सफाई तथा बाहरीलोगो को जंगल मे घुसपैठ। हांलाकि ये उन लोगो के लिये अच्छा संकेत है उन्हे अब जीवन के मूल्यो तथा बाहर की दुनिया की जानकारी के विषय मे पता चल रहा है वो अब अपने घरो के बाहर सजे खापड़ी को निकाल कर फेंक रहे है। और अब वो पढ़ने तथा बाजार लगाने जैसी चीजे सीख रहे है। अब ये प्रगति ही उनका प्रतिनिधित्व करेगी।