एक भारतीय आदमी जो चार वर्ष की आयु में चलती गाड़ी मे दूर निकल कर अपने घर से भटक गया था

एक भारतीय आदमी जो चार वर्ष की आयु में चलती गाड़ी मे दूर निकल कर अपने घर से भटक गया था

एक भारतीय आदमी जो चार वर्ष की आयु में चलती गाड़ी मे दूर निकल कर अपने घर से भटक गया था तथा एक ऑस्ट्रेलियन दंपति के द्वारा गोद ले लिया गया था और उनके साथ ऑस्ट्रेलिया चला गया था उसने अपनी अविश्वसनीय कहानी को एक पुस्तक मे दोहराया है और वो सिर्फ इसलिये की वो अपनी खोई मां को ढूंढ सके जिनसे उससे 25 वर्ष पहले बिछड़ गया था।

शेरू बैरियरली का असली नाम था शेरु मुन्शी खान उसका जन्म खंडवा, मध्य प्रदेश के एक उपनगर गणेश तलई में हुआ था। जब वह छोटा था, तो उसके पिता ने उसकी मां को छोड़ दिया, और वो सड़क पर आ गया था। उसकी माँ खुद को और उसके बच्चों का पालने के लिये जहां निर्माण होता था वहां काम करने लगी किंतु फिर भी अक्सर उन्हे दोनो समय का खाना नही मिल पाता था और शायद इसलिये उसकी मां कभी उसे स्कूल नही भेज पायी। पांच साल की उम्र में, शेरू और उनके बड़े भाई, गुड्डू और कल्लू, भोजन और पैसे के लिए रेलवे स्टेशन पर भीख मांग रहे थे। गुड्ड कभी-कभी ट्रेन गाड़ियों के फर्श को साफ करके पैसा कमा लेता था । एक शाम, गुड्डू ने कहा कि वह ट्रेन से खांदवा जा रहा है जो बुरहानपुर शहर के पास है शेरू ने अपने बड़े भाई से पूछा कि क्या वह भी जा सकता है। गुड्डु अनिच्छा से सहमत हुआ। जब तक ट्रेन बुरहानपुर पहुंची, शेरू बहुत थक गया था, वह वहीं एक सीट पर सो गया था। गुड्डू ने अपने छोटे भाई को इंतजार करने के लिए कहा और शीघ्र ही वापस आने का वादा किया। गुड्डू वापस नहीं आया, और शेरू आखिरकार अधीर हो गया। उसने देखा कि स्टेशन में एक दूसरी ट्रेन खड़ी हुई है उसे लगा की उसका भाई उसी मे है वह उस खाली गाड़ी पर चढ़ गया। उसने पाया कि उसे गाड़ियों के लिए कोई द्वार नहीं था। उसने सोचा की उसका भाई जल्द ही आ जायेगा और ये सोचते हुये वो सो गया। जब वह जाग गया, तो ट्रेन अपरिचित देश में यात्रा कर रही थी। कभी-कभी रेलगाड़ी छोटे स्टेशनों पर रूकती थी, लेकिन शेरू बचने के लिए दरवाजा खोलने में असमर्थ था। उसकी रेल यात्रा अंततः कलकत्ता (जिसे आज कोलकाता के नाम से जाना जाता है) में हावड़ा रेलवे स्टेशन पर समाप्त हो गया, और जब किसी ने गाड़ी कादरवाजा खोल दिया तो वह भाग गया। शेरू को उस समय यह नहीं पता था, लेकिन वह अपने गृह नगर से लगभग 1,500 किलोमीटर दूर था।

एक भारतीय आदमी जो चार वर्ष की आयु में चलती गाड़ी मे दूर निकल कर अपने घर से भटक गया था

शेरू ने विभिन्न ट्रेनों पर चढ़कर घर लौटने का प्रयास किया, लेकिन वे सारे लोकल ट्रेन में साबित हुए और हर एक ने उसे फिर से हावड़ा रेलवे स्टेशन पर वापस पहुंचा दिया। वह हावड़ा रेलवे स्टेशन पर ही हफ्ते या उसके आसपास रहा ताकि उसका भाई उसे मिल जायें। वह सड़को के किनारे कूड़े के ढेर से खाना चुन कर खता और स्टेशन की सीटों के नीचे सोता। आखिरकार वह एक रेलवे कार्यकर्ता द्वारा पाया गया, जिसने उसे ले लिया और उन्हें खाना और आश्रय दिया। लेकिन जब एक दिन उस व्यक्ति ने उसे एक मित्र को शेरू को दिखाया तो उसने महसूस किया कि कुछ सही नहीं था, तो वह वहां भाग गया दो लोगों ने उसका पीछा किया, लेकिन वह भागने में कामयाब रहा।

शेरू को अंततः एक भले किशोरी से मुलाकात हुयी, जो उसे एक पुलिस थाने में ले गयी और बताया कि वह एक खोया बच्चे हो सकता है पुलिस ने शेरू को एक सरकारी केंद्र जो बच्चो के लिये ही था वहां में ले जा कर छोड़ दिया। सप्ताह बाद में, उसे गोद लेने के लिये इंडियन सोसाइटी में स्थानांतरित कर दिया गया। कर्मचारियों ने उसके परिवार का पता लगाने का प्रयास किया लेकिन शेरू अपने घर के बारे मे ज्यादा मालूम नही था जिसकी वजह से अधीकारी नाकाम रहे और आखिकार उसे आधिकारिक तौर पर एक खोया बच्चा घोषित किया गया। बाद में ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया, होबार्ट के ब्रीएर्ली परिवार ने उसे गोद ले लिया।

इस बीच उनकी मां कमला मुंशी अपने दोनो बेटो को खोज रही थीय और कुछ हफ्तों के बाद पुलिस ने उन्हें बताया कि गुड्डू का शरीर रेलवे पटरियों के पास पाया गया था ठीक वहां से एक किलोमीटर दूर जहां शेरू को वो सोता हुआ छोड़ कर गया था। उसने अपनी सारी ऊर्जा को शेरू की तलाश में लगा दिया था ट्रेनों के विभिन्न स्थानों पर जाकर। उसकी वापसी के लिए वह प्रार्थना करने के लिए हर सप्ताह एक मस्जिद मे जाता था।

जबकि ऑस्ट्रेलिया मे अपने गोद लिये परिवार के साथ रह रहा था उस परिवार एक और बच्चे को गोद लिया जिसका नाम मंतोष था। उसने अंग्रजी सीखी और अपनी भाषा हिंदी भूल गया। बड़ा होने पर उसने कैनबरा में ऑस्ट्रेलियाई अंतर्राष्ट्रीय होटल स्कूल में व्यवसाय और आतिथ्य की पढाई की। वह दिन रात गूगल पर अपने शहर को ढंूढता रहता था वो हावड़ा के स्टेशनो को बड़ी बारीकी से देखता हांलाकि उसे अपने घर के बारे मे ज्यादा याद नही था बस कुछ धुंधली तस्वीरे थे की वो स्टेशन के बाहर जहां वह खेलता था। औश्र जल्द ही उसे एक सहायता मिली उसे फेसबुक का एक गु्रप जो खंडवा से था उससे सहायता मिली और उसे लगा की वही उसका घर हो सकता है

2012 में, शेरू ने भारत में खांडवा की यात्रा की और वहां के निवासियों से पूछा कि अगर उन्हें 25 साल पहले अपने बेटे को खोये हुये किसी भी परिवार के बारे में पता था। उसने अपने बचपन की एक तस्वीर उन्हंे दिखायी। स्थानीय लोगों ने उसे शीघ्र ही उसकी मां के पास ले गये जहां वह अपनी बहन शकिला और उसके जीवित भाई कल्लू से मुलाकात हुयी जो एक स्कूल शिक्षक और कारखाने प्रबंधक था । शेरू और गुड्डू के बाद उनकी मां ने अपने बचे दोनो बच्चो को स्कूल भेजना शुरू कर दिया था। शेरू अभी भी होबार्ट मे रहता है