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यह वाकया मार्च, 2007 का है। देश की राजधानी में शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च को सी.पी.आई (एम.एल) ने एक रैली का आयोजन किया था। इस रैली में देश के अलग-अलग इलाकों से एक लाख से अधिक लोग आये थे और पूरा रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था। यह रैली यू.पी. सरकार की अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने घुटनाटेकू रवैये और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ गरीब और मेहनतकश लोगों की आवाज’ बुलन्द करने के लिए बुलाई गयी थी, लेकिन उस शाम एकाध अपवादों को छोड़कर 24 घण्टे के उन दजर्’नों चैनलों में से किसी ने इस रैली को खबर लायक नहीं माना। जिन चैनलों के लिए कमिश्नर के कुत्ते का गायब होना, राखी सावंत की सगाई या अमिताभ बच्चन को सर्दी-जुकाम होना ब्रेकिंग न्यूज लगता है, उनके लिए दिल्ली के लाखों गरीबों का आना और अपनी आवाज’ बुलन्द करना कोई खबर नहीं थी। आप कह सकते हैं कि तमाम बेसिर-पैर की ‘खबरें’ दिखाने वाले चैनलों से और क्या उम्मीद की जा सकती है?
एक दिन ट्रैन मे स्लीपर ड्यूटी के दौरान ही एक यात्री ने मुझे एक मोटी-सी डायरी दी कि यह टीटी बाबू की छूट गयी है। आपके आने के पहले चेकिंग पार्टी के टीटी लोग यहां बैठै थे। वे मुगलसराय से इस गाड़ी मे चढ़े थे। चेंकिग करने के बाद यहीं बैठ गए थे यह केबिन खाली ही थी एगो टीटी बाबू जो बुजुर्ग से थे साईड वाली बर्थ पर बैठकर कुछ लिख पढ रहे थे। पैन्ट्रीकार से चाय आयी थी सब लोग चाय पी ही रहे थे की आपलोगो के अफसर ने शायद एसी कोच मे थे खबर भिजवाई की अगले स्टापेज पर उतर जाना है कोई दूसरी गाड़ी चेक करना है सासाराम स्टेशन पर टीटी उतर गए। साईड बर्थ पर जो बैठे थे लगता है यह डायरी उन्हीं की थी। वे कुछ अपसेट भी लग रहे थे। डायरी काफी पुरानी थी वर्ष 1983 प्रिंट था।
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फणीश्वर नाथ ’रेणु’ हिंदी साहित्य के प्रेमचंद काल के बाद के क्रांतिकारी उपन्यासकार थे। वह समकालीन ग्रामीण भारत की आवाज और अग्रदूतों के बीच मुख्यधारा की हिंदी साहित्य में क्षेत्रीय आवाज लाने वाले लेखक थें। उनका जन्म 4 मार्च 1921 को पूर्णिया जिले के औरही हिंगना में हुआ था। उन्होंने अररिया और फॉरबिसगंज में अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की।...