नूर इनायत खान एक भारतीय जासूस जिसके अंतिम शब्द थे ’स्वतंत्रता’

नूर इनायत खान एक भारतीय जासूस जिसके अंतिम शब्द थे ’स्वतंत्रता’

नूर का जन्म 1914 में हुआ था। छोटी सी उम्र में वह अपने परिवार के साथ इंग्लैंड चली गईं। वहां रहते हुए नूर ने एयर फोर्स के महिला सहायक दल में जॉइन किया। उनकी फ्रेंच की अच्छी जानकारी और बोलने की क्षमता ने स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया और फिर वह बतौर जासूस काम करने के लिए तैयार हो गईं। किंतु उनके लिये ये सब इतना आसान नही था प्रशिक्षण बहुत कड़ा होता था खासकर मानसिक। एक बार तो उन्होने यहा तक कह दिया था कि वो झूठ नही बोलेगीं। ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स के दस्तावेजों के मुताबिक इसके बावजूद नूर के आला अफसरों को लगता था कि उनका किरदार एक दृढ़ इरादे वाली महिला का है. उन्हें जो जिम्मेदारी दी गई, वो बहुत खतरनाक किस्म की थी. नूर को एक रेडियो ऑपरेटर के तौर पर ट्रेन किया गया और जून, 1943 में उन्हें फ्रांस भेज दिया गया। नूर इनायत खान की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक और बेहद दिलचस्प रही है। वह हजरत इनायत खान की बेटी थीं. हजरत इनायत खान वही शख्स थे जिन्होंने भारत के सूफीवाद को पश्चिमी देशों तक पहुँचाया.

नूर का पूरा नाम नूर-उन-निसा इनायत खान था। वे चार भाई-बहन थी। भाई विलायत का जन्म 1916, हिदायत का जन्म 1917 और बहन खैर-उन-निसा का जन्म 1919 में हुआ था। उनके पिता भारतीय और माँ अमेरिकी थीं। उनके पिता हजरत इनायत खान 18वीं सदी में मैसूर राज्य के शासक टीपू सुल्तान के पड़पोते थे, जिन्होंने भारत के सूफीवाद को पश्चिमी देशों तक पहुँचाया था। वे एक धार्मिक शिक्षक थे, जो परिवार के साथ पहले लंदन और फिर पेरिस में बस गए थे। नूर की रूचि भी उनके पिता के समान पश्चिमी देशों में अपनी कला को आगे बढ़ाने की थी। नूर संगीतकार भी थीं और उन्हें वीणा बजाने का शौक था। वहाँ उन्होंने बच्चों के लिए कहानियाँ भी लिखी और जातक कथाओं पर उनकी एक किताब भी छपी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद उनका परिवार मॉस्को से लंदन, इंग्लैण्ड आ गया था, जहाँ नूर का बचपन बीता। वहाँ नॉटिंग हिल में स्थित एक नर्सरी स्कूल में दाखिले के साथ उनकी शिक्षा आरम्भ हुई। 1920 में वे फ्रांस चली गईं, जहाँ वे पेरिस के निकट सुरेसनेस के एक घर में अपने परिवार के साथ रहने लगीं जो उन्हें सूफी आंदोलन के एक अनुयायी के द्वारा उपहार में मिला था। 1927 में पिता की मृत्यु के बाद उनके ऊपर माँ और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गई। स्वभाव से शांत, शर्मीली और संवेदनशील नूर संगीत को जीविका के रूप में इस्तेमाल करने लगी और पियानो की धुन पर सूफी संगीत का प्रचार-प्रसार करने लगी। कवितायें और बच्चों की कहानियाँ लिखकर अपने कैरियर को सँवारने लगीं साथ ही फ्रेंच रेडियो में नियमित योगदान भी देने लगीं।

नूर इनायत खान एक भारतीय जासूस जिसके अंतिम शब्द थे ’स्वतंत्रता’

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नूर विंस्टन चर्चिल के विश्वसनीय लोगों में से एक थीं। उन्हें सीक्रेट एजेंट बनाकर नाजियों के कब्जे वाले फ्रांस में भेजा गया था। नूर ने पेरिस में तीन महीने से ज्यादा वक्त तक सफलतापूर्वक अपना खुफिया नेटवर्क चलाया और नाजियों की जानकारी ब्रिटेन तक पहुंचाई। पेरिस में 13 अक्टूबर 1943 को उन्हें जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान खतरनाक कैदी के रूप में उनके साथ व्यवहार किया जाता था। हालांकि इस दौरान उन्होंने दो बार जेल से भागने की कोशिश की, लेकिन विफल रहीं।?

गेस्टापो के पूर्व अधिकारी हैंस किफर ने उनसे गुप्त सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। 25 नवम्बर 1943 को इनायत एसओई एजेंट जॉन रेनशॉ और लियॉन के साथ पेरिस के हेडक्वार्टर से भाग निकलीं, लेकिन वे ज्यादा दूर तक भाग नहीं सकीं और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 27 नवम्बर 1943 को नूर को पेरिस से जर्मनी ले जाया गया। नवम्बर 1943 में उन्हें जर्मनी के फॉर्जेम जेल भेजा गया। इस दौरान भी अधिकारियों ने उनसे खूब पूछताछ की, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं बताया।

उन्हें दस महीने तक घोर यातनायें दी गईं, फिर भी उन्होंने किसी भी प्रकार की सूचना देने से मना कर दिया। नूर की जब गोली मारकर हत्या की गई, तो उनके होंठों पर शब्द था ’स्वतंत्रता’।