किसका मीडिया कैसा मीडिया

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यह वाकया मार्च, 2007 का है। देश की राजधानी में शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च को सी.पी.आई (एम.एल) ने एक रैली का आयोजन किया था। इस रैली में देश के अलग-अलग इलाकों से एक लाख से अधिक लोग आये थे और पूरा रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था। यह रैली यू.पी. सरकार की अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने घुटनाटेकू रवैये और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ गरीब और मेहनतकश लोगों की आवाज’ बुलन्द करने के लिए बुलाई गयी थी, लेकिन उस शाम एकाध अपवादों को छोड़कर 24 घण्टे के उन दजर्’नों चैनलों में से किसी ने इस रैली को खबर लायक नहीं माना। जिन चैनलों के लिए कमिश्नर के कुत्ते का गायब होना, राखी सावंत की सगाई या अमिताभ बच्चन को सर्दी-जुकाम होना ब्रेकिंग न्यूज लगता है, उनके लिए दिल्ली के लाखों गरीबों का आना और अपनी आवाज’ बुलन्द करना कोई खबर नहीं थी। आप कह सकते हैं कि तमाम बेसिर-पैर की ‘खबरें’ दिखाने वाले चैनलों से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

लेकिन अगले दिन ‘द हिन्दू’ जैसे एकाध अपवादों को छोड़कर दिल्ली के तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों में भी इस रैली के बारे में एक लाइन की भी खबर नहीं थी। ऐसा लगा कि जैसे दिल्ली में कल रैली जैसी कोई चीज’ हुई ही न हो। क्या यह सिर्फ एक संयोग था? जी नहीं, यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सुनियोजित ब्लैकआउट था। इस ब्लैकआउट में साफ तौर पर एक पैटर्न देखा जा सकता है। यह पहली घटना नहीं थी और न ही ऐसा सिर्फ सी.पी.आई-एम.एल की रैली के साथ हुआ था। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। सबसे ताजा उदाहरण है 2009 के नवम्बर में दिल्ली में प्रदर्शन करने आए गन्ना किसानों की रैली के साथ राष्ट्रीय मीडिया खासकर अंग्रेजी अखबारों और चैनलों का व्यवहार। दिल्ली के सबसे बड़े अखबार होने का दावा करने वाले दोनों अंग्रेजी अखबारों ने अपने कवरेज में इस बात पर सबसे अधिक जोर दिया कि कैसे किसानों की इस भीड़ ने दिल्ली में जाम लगा दिया और इससे दिल्लीवालों को कितनी तकलीफ हुई? यह भी कि किसानों की यह भीड़ कितनी अनुशासनहीन थी और उसने किस तरह से शहरियों के साथ बदतमीजी की, शहर को गन्दा किया और तोड़फोड़ करके चले गये। गोया किसान न हों, बल्कि तैमूरलंग की सेना ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया हो।

ये दोनों ही घटनाएँ अपवाद नहीं हैं। पिछले डेढ़-दो दशकों में ऐसी सैकड़ों घटनाएँ हुई हैं, जिनमें कार्पोरेट मीडिया ने इसी तरह दिल्ली आनेवाले गरीबों, खेतिहर मजदूरों, भूमिहीनों, दलितों, आदिवासियों और विस्थापितों के प्रदर्शनों को नज’रन्दाज किया है या फिर उन्हें दिल्ली की शान्ति और यातायात व्यवस्था के लिए समस्या के बतौर पेश किया है। इन रिपोर्टों को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे प्रदर्शन करना या धरना देना या फिर अपनी आवाज’ उठाना कोई गुनाह हो। हालाँकि लोकतान्त्रिाक व्यवस्था में अपनी बात कहने और धरना, प्रदर्शन और रैली का अधिकार नागरिकों का बुनियादी अधिकार है, लेकिन ऐसा लगता है कि कार्पोरेट समाचार माध्यमों का लोकतन्त्रा में विश्वास नहीं है या कम से कम वे गरीबों को यह अधिकार देने के लिए तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि बिना किसी अपवाद के गरीबों और हाशिये पर पड़े लोगों के प्रदर्शनों को अनदेखा किया जाना जारी है।

यह एक अघोषित सा नियम बन गया है। एक बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत इस तरह के विरोध प्रदर्शनों और रैलियों को अनदेखा किया जाता है। यही नहीं, आमतौर पर गरीबों और हाशिये पर पड़े लोगों की रैलियों, धरनों, आन्दोलनों और प्रदर्शनों की कभी भी तथ्यपरक और वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग नहीं होती है। कभी भी उनके मुद्दों और सवालों को सही परिप्रेक्ष्य और तथ्यों के साथ रिपोर्ट नहीं किया जाता है। मजदूर आन्दोलनों को बिल्कुल ब्लैकआउट किया जाता है। अखबारों या चैनलों को पढ़कर या देखकर पता नहीं चल सकता है कि श्रमिकों की क्या स्थिति है। दिल्ली के ही अखबारों और चैनलों को ले लीजिये, जब तक हिंसा या कोई बहुत बड़ी घटना न हो जाए, श्रमिकों की समस्याओं और संघर्षों के बारे में एक पंक्ति की खबर नहीं होती है, जबकि दिल्ली के आसपास नोएडा, साहिबाबाद, गुड़गाँव आदि में हजारों फैक्टरियाँ हैं और उनमें लाखों मजदूर काम करते हैं, लेकिन किसी अखबार या चैनल में श्रम बीट को कवर करने के लिए कोई रिपोर्टर नहीं है। कार्पोरेट मीडिया को यह विषय रिपोर्टिंग के लायक नहीं लगता है। इसमें एक साफ पूर्वाग्रह झलकता है, पर पूर्वाग्रह को श्रमिकों-प्रबन्धन के विवादों में खुले तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें कार्पोरेट मीडिया ने खुलकर प्रबन्धन का साथ दिया है।

साभारः समवेद