एक पुस्तक माता पिता के लिए:अन्तोन सेम्योनोविच माकारेंको

एक पुस्तक माता पिता के लिए:अन्तोन सेम्योनोविच माकारेंको

अन्तोन सेम्योनोविच माकारेंको के शैक्षिक क्रिया-कलाप बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में सम्पन्न हुए थे। वे रूसी बुद्धिजीवियों की उस पीढ़ी के थे, जिसके कंधो पर नयी, समाजवादी संस्कृति की नींव के निर्माण के महान, सुखद, परन्तु कठिन कार्य में हाथ बंटाने का उत्तरदायित्व था। उस महान सोवियत शिक्षाशास्त्री की रचनात्मक विरासत कम्युनिस्ट लालन-पालन व शिक्षा-दिक्षा के सिद्धांत व व्यवहार की प्रणाली में एक महान योगदान है और वह हमारे आज के युग के लिए भी महत्वपूर्ण है।

अन्तोन सेम्योनोविच माकारेंको का जीवन उनकी युवावस्था से ही शिक्षा-शास्त्र को समर्पित था। उनका जन्म 1888 में एक बड़े यूक्रानी मजदूर परिवार में हुआ था। उनके मातस-पिता अनपढ़ थे, लेकिन वे ज्ञान के महत्व तथा शक्ति को जानते थे और वे इस तथ्य को महत्व देते थे कि उनके बेटे को बचपन से पुस्तकों का बहुत चाव था। अन्तोन पांच वर्ष की अवस्था से ही धाराप्रवाह पाठ कर सकता था। 1895 में उन्हे एक प्राथमिक पाठशाला में भर्ती कर दिया गया।

1900 में उनका परिवार क्रेमेचूग नगर के निकट क्रियूकोवो गांव में रहता था। अन्तोन क्रेमेंचूग नगर के स्कमल में अध्ययन किया। उस स्कूल का पाठ्य-क्रम खासा प्रभावशाली थाः वहां रूसी अंकगणित, भूगोल, इतिहास, प्राकृतिक-विज्ञान, भौतिकी के अलावा रेखांकन, चित्रांकन, संगीत तथा व्यायाम की शिक्षा भी दी जाती थी।

अन्तोन कुशाग्र-बुद्धि का विद्याार्थी था। उन्हें उस समय रूसी और विदेशी क्लासिकी साहित्य का जितना ज्ञान था, वह उनकी उम्र के बालक के लिए एक आश्चर्यजनक बात थी। उन्हें दर्शनशास्त्र, प्राकृतिक विज्ञान और कला-समालोचना का आधारभूत ज्ञान भी था। माकारेंको ने सोलह वर्ष की अवस्था में स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली और उसी स्कूल के वार्षिक शैक्षिक पाठ्य-क्रम में भर्ती हो गये।वह स्कूल के वार्षिक शैक्षिक पाठ्य-क्रम में भर्ती हो गये। वह स्कूल प्राथमिक स्कूलों के लिए अघ्यापकों को प्रशिक्षित करता था।

1905 के वसन्त में माकारेंको ने शैक्षिक पाठ्य-क्रम पूरा किया और उसी साल के क्रियूकोवो के प्राथमिक स्कूल मे पढाना शुरू कर दिया उन्हे बहुत सारी बातों का ज्ञान था और वे विद्याादान करने, शिक्षार्थियो को चिंतन तथा विवेचन करना सिखलाने में समर्थ थे। लेकिन इस महान भावी शिक्षाशास्त्री को एक अच्छा बन गये थे, तो वे एक ऐसी गलती कर बैठे, जिससे उन्हें बहुत वेदना हुई। एक शिक्षा-सत्र के परिणामों का समाहार करते समय उन्होनें एक शैक्षिक प्रयोग करने का निर्णय किया। मकारेंको ने प्रत्येक विद्यार्थी के औसत अंको की गणना की और एक विद्यार्थी को प्रमाण-पत्र दिया-''सैं तीसवां और अंतिम''। बाद में उन्हे ज्ञात हुआ कि उस विद्यार्थी को यह प्रमाण-पत्र इसलिए नही मिला की वह सुस्त था , बल्कि इसलिए मिला की वह गम्भीर और लाइलाज बीमारी से ग्रस्त था। इससे उस लड़के को अतीव दुख हुआ।........

इस घटना से माकारेंको का दिल टूट गया। उस युवा अध्यापक ने कटु अनुभव से सिखा कि स्कूल में सफल होने के लिए केवल पढ़ाने की ही नही, बल्कि शिक्षार्थियों के लालन-पालन भी जरूरी है। कौन जाने, इसी घटना से उनके मन में यह विचार उपजा हो कि लालन-पालन की पद्धतियों को केवल अध्यापन तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है, कि यह शिक्षा-विज्ञान का ऐसा विशेष व स्वतंत्र क्षेत्र है, जिसका अपना ही विषय तथा अपने ही नियम है। 1911 में अन्तोन सेम्योनोविच माकारेंको को दोलींस्काया रेलवे-स्टेशन को स्थानांतरित कर दिया गया। इस युवा अध्यापक ने शिक्षार्थियों को अनेक दिलचस्प कार्य-कलाप में लगाकर उनके फालतू समय का सदुपयोग किया। वे नाटकों का मंचन, फैन्सीडेªस नृत्य-समारोहों तथा खेलों का आयोजन करते थे। वे भावनाओं को संज्ञान से मिलाते हुए अध्यापन का अपना काम भी बड़ी ही कुशलता से करते थे।

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