अनिकेत की डायरी पार्ट--- मंत्री जी का विशेषाधिकार

अनिकेत की डायरी पार्ट-1 रामदेव सिंह

नार्थ इस्ट एक्सप्रेस, एक गाड़ी है जिसमे हर रोज कुछ न कुछ घटता ही रहता है। कभी मिलिट्री यात्रियों का उत्पात......तो कभी नेताओं का, कन्डक्टर विवेक से काम न ले तो हर दिन पिटना तय है। परसो की ही बात है.... नार्थ इस्ट एक्सप्रेस में मेरी ड्युटी थी गाड़ी आने के पहले ही एक मेमो बैच इंचार्ज (टी.सी) ने दिया और दूसरा डिप्टी एसएस ने... दोनों का मजमून एक ही था पटना से बिहार के चार मंत्रियो को कटिहार जाना है, उनके लिए सेकेण्ड एसी में चार बर्थ चाहिए। गाड़ी आने पर पिछले कन्डक्टर ने बता दिया कि एक भी जगह खाली नहीं है। मैनें बैच इंचार्ज और डिप्टी एसएस दोनों को बता दिया कि कोई जगह नहीं है। गाड़ी बक्सर में रूकी तो वहां का डिप्टी एसएस भी मेमो लेकर आया -'एरेन्ज फोर बर्थ फाॅर कैबिनेट मिनिस्टर आॅफ बिहार....' मैंने मेमो रिसीव कर लिया और रिसीविंग काॅपी में 'नो रूम्स' लिख दिया। लेकिन गाड़ी जैसे-जैसे पटना पहुंच रही थी, मेरा तनाव बढ़ता जा रहा था मेमो में किशनगंज के जिस कुख्यात मंत्री फखरूद्दीन अंसारी का नाम लिखा था जिससे सभी टीटीई रहते है। पूर्णिया, कटिहार अररिया के प्रायः सभी सांसद-विधायक एक जैसे हैं। इन्हे नियम-कानून से कोई मतलब नहीं है। मुगलसराय के आधे से अधिक कन्डक्टर तो गाड़ी मे ड्युटह करना ही नहीं चाहते! और जब भी जाते हैं.. किचकिच होना तय है क्योंकि उन्हें जैसे भी , जगह चाहिए भले किसी यात्री को उनकी बर्थ से बेदखल क्यों न करना पड़े। ये मंत्री-विधायक अपने साथ पांच-दस की संख्या में चेले-चाटी लेकर जरूर रखते हैं। फखरूद्दीन अंसारी को जब सुविधा नहीं मिलती है तो वह गालियों से ही बात करता है।

पटना में गाड़ी खड़ी हुई तो यात्रियो ने मुझे घेर लिया। सबकी एक ही मांग, एक बर्थ दे दीजिए! सबके लिय एक ही जवाब-'कोई जगह नहीं है' टीसी ने पटना कोटे का चार्ट देते हुए कहा 'चार गो मंत्री चढ़ा है दू गो कन्फर्म है और दू गो एरेन्ज करना है' मैंने कहा कि मेसेज भेज दिया था कि कोई जगह नहीं है। तभी एक सिपाही आकर बोला-'मंत्री जी बुला रहे है!' भीतर गया तो 37 से 40 वाले केबिन में माननीय मंत्री फखरूद्दीन अंसारीके साथ तीन अन्य लोग भी थे। उन्होनें पहले बैठने कहा, फिर पूछा -'क्या नाम है आपका?' मैं समझ गया वे मेरी दाढ़ी देखकर कन्फर्म होना चाहते हैं कि मैं मुस्लिम हुं या नहीं? मैने जब अपना नाम बताया तो यह भी जोड़ दिया कि मेरा घर भी आपके इलाके में ही है! उन्होने पूछा'कहां?' मैने बताया-'पूर्णियां' मेरी रणनीति सही थी उनकी आक्रामकता थोड़ी कम हुई वे वहां चुनाव लड़ चुके थे, इसलिए मेरे गांव को भी जानते थे। उन्होने कहा-'इस केबिन में और किसी को मत भेजिएगा हम चारों लोग इसी मे रहेंगें' मैने चार्ट निकाल कर देखा इसमे दो बर्थ दूसरे यात्रियों के नाम आरक्षित था। मैने कहा 'ठीक है, ये लोग टर्नअप नहीं होगें तो आपलोग ले लीजिएगा!' तभी ऊपर के बर्थ से आवाज आयी-'40 नंबर मेरा है!'

मैं उसके टिकट देखता उसके पहले ही फखरूद्दीन अंसारी ने अपने सिक्यूरिटी गार्ड से कहा-इसका सामान बाहर करो जी!' यात्री ने प्रतिवाद करना चाहा लेकिन सिक्यूरिटी गार्ड ने यात्री का सामान उठाकर केबिन के बाहर कर दिया। यात्री प्रतिरोध में नीचे उतरा तो फखरूद्दीन अंसारी ने खड़े होकर परदे के बाहर ठेल दिया। यात्री मुझ पर बिफरता इससे पहले ही मैंने उसे इशारे से बुलाया। -आइए, मैं आपको दूसरी बर्थ देता हूं' इस बीच गाड़ी खुल चुकी थी। कोच में अफरातफरी जैसी स्थिति थी। दस से अधिक लोग जो स्वंय को मंत्री जी के साथ होने की बात कह रहे थे दूसरों के बर्थ पर बैठ गए थे। कुछ लोग जमीन पर ही चादर बिछा कर लेट गए थे। जिस बर्थ पर मैनें अपना बैग रखा था उस पर भी चार लोग बैठे थे। हालांकि यह बर्थ बरौनी कोटे का था लेकिन तत्काल उस यात्री को एडजस्ट करना जरूरी था अन्यथा कमप्लेन होना तय था मुझे एक तरकीब सूझी। मैनें उन चारो से कहा कि इस जगह को छोड़िये मंत्रीजी ने भेजा है! इनकी जगह मंत्री जी ने ली है। मंत्री के नाम पर चारों ने बर्थ तुरंत छोड़ दिया। जब मैंने उसे इस गाड़ी में मंत्रियो, सासंदो और विधायकों के आतंक के बारे मे बताया तो वह भी सहम गया! मैने उसे यह भी पूछा कि यदि वह आपके साथ मारपीट ही कर देते तो आप क्या करते?.. यहां से लेकर किशनगंज तक कोई एफआईआर भी नहीं लेगा आप फखरूद्दीन अंसारी नेता का नाम नहीं सुने है?...यही है न!... इसका बेटा इससे भी आगे है... 'यात्री के चेहरे पर भय की हल्की-सी छाया उभरी'-तब तो इस गाड़ी से जर्नी सेफ नही है...' वह मेरी मजबूरी को समझ गया था मैनें उसे भरोसा दिलाया-'ठीक है अब आप सोइए.. वैसे यह भी बरौनी कोटा है.... लेकिन चूंकि एक बर्थ खाली होने वाला है इसलिए मै अगले कंडक्टर को समझा दूंगा। 'मैने पटना कोटे के बाकी यात्रियों के टिकट जल्दी जल्दी में चेक किया मेरे पास अब बैठने की कोई जगह नहीं थी जहां बैठकर मैं रिलीफ मेमो तैयार करमा! एटेन्डेन्ट वाले पटरे पर बैठकर चार्ट तैयार किया। बरौनी पहुंचते-पहुंचते एसी के तीनों डिब्बों के यात्री नींद के आगोश में चले गए थे। डिब्बों के अंदर चलना मुश्किल था क्योंकि काॅरिडोर मंें जमीन पर भी कुछ वेटिंग वाले.. कुछ रेलवे के पास होल्डर्स कुछ सिपाही-दरोगा और कुछ मंत्रीयों के चेले-चाटी.... सभी आरे तिरछे सो गए थे। मैं भी जल्द से जल्द बरौनी जंक्शन पहंुचने की व्यग्रता में था ताकि अपना तनाव अगले कंडक्टर पर डालकर मुक्त हो सकुं!

साभारः गुंज पत्रिका

अनिकेत की डायरी पार्ट-1