कॉमन मैन-उम्मीदें, आकांक्षाएं, मुसीबतों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक साधारण इंसान

कॉमन मैन-उम्मीदें, आकांक्षाएं, मुसीबतों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक साधारण इंसान

रासिपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण, जिन्हें आर.के. लक्ष्मण के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय कार्टूनिस्ट थे जिन्होंने कॉमिक स्ट्रिप 'यू सैड इट' का निर्माण किया था, जिसमें 'कॉमन मैन' - एक मूक पर्यवेक्षक जो आम भारतीय नागरीक का प्रतिनिधित्व करता है। कॉमिक स्ट्रिप ने आम भारतीय के जीवन मे हो रही उनकी आशाओं, आकांक्षाओं, और परेशानी का जिक्र किया है। भारतीय जनता के बीच यह चरित्र बहुत प्यारा है और पिछले कुछ दशकों में भारतीयों की पीढ़ियों का मनोरंजन किया है। ड्राइंग के साथ लक्ष्मण के आकर्षण की शुरुआत शुरू हो गई और पढ़ने से पहले ही उन्हें पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में चित्रों को देखना उन्हे पसंद आने लगा। वह जितनी जल्दी हो सके ड्राइंग करना शुरू कर दिया और अपने घर की फर्श और दीवारों को डूडल के साथ भर दिया। उन्हे ये एहसास होने में लंबा नहीं लगा कि ड्राइंग ही उनके जीवन का लक्ष्य था।

24 अक्टूबर 1 9 21 को भारत के मैसूर में एक हेडमास्टर के घर पर उनका जन्म राशीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण के रूप में हुआ था । पिता का नाम था कृष्णस्वामी। लक्ष्मण का नाम और गाँव का नाम मिलकर बना- रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण। सारे भाई बहनों में सबसे छोटे थे, बड़े भाई थे आरके नारायण, जिन्हें दुनिया अँगरेजी के जाने माने लेखक के तौर पर जानती है दोनों भाइयों के स्वभाव में जबर्दस्त विरोधाभास था नारायण पढ़ाकू और लिक्खाड़। लक्ष्मण खेलकूद़ और पढ़ने लिखने से दूर भागते थे शौक एक ही था- घर में जहाँ भी खाली जगह दिखती रेखाचित्र बनाने लग जाते दीवार, फर्श, दरवाजे, खिड़कियाँ- सभी पर लक्ष्मण रेखाओं का हुनर दिखाते रहते एक दिन माँ ने समझाया, "बेटा कम से कम ग्रेजुएट तो हो जाओ. घर में कौन सा कारोबार चल रहा है, जो बिना पढ़े लग जाओगे. लक्ष्मण को लगा, माँ ठीक कहती है. इसके बाद उन्होंने पढाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया, लेकिन रेखाओं से नाता बना रहा. सुनने में हैरानी होती है कि मुंबई के जाने माने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स ने लक्ष्मण को एडमिशन के अयोग्य माना था. वर्षों बाद उसी स्कूल ने उन्हें अपने सालाना जलसे में बतौर चीफगेस्ट बुलाया। इस तरह के संयोग तो लक्ष्मण की जिन्दगी में भरे पड़े हैं. हिंदुस्तान टाइम्स ने उन्हें संघर्ष के दिनों में नौकरी नहीं दी. बाद में उन्हें दुर्गारत्न से सम्मानित किया. इंडियन एक्सप्रेस में उन्हें रोजगार नहीं मिला। अरसे बाद उसी समूह ने गोयनका अवार्ड दिया. टाइम्स ऑफ इंडिया में महीनों तक पॉलिटिकल कार्टून बनाने का मौका नहीं मिला और एक दिन घर बैठे थे तो संपादक ने बुलाकर पॉलिटिकल कार्टून बनाने का न्यौता दिया. आगे जाकर टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी माँगने पहुंचे तो ढाई सौ रूपये महीने पगार चाही थी. नौकरी मिली तो पांच सौ रूपये महीने के वेतन पर।

उन्हें 'आम आदमी' के निर्माता के रूप में सबसे ज्यादा याद किया जाता है, एक साधारण ढोल जैसे कपड़े तथा सर पर कुछ बिखरे बाल तथा कुछ झुककर चलने का वो अंदाज मानो जिम्मेदारीयो के भार पीठ पर लदी हो मध्यम आयु वर्ग का आदमी, जो औसत भारतीय का प्रतिनिधित्व करता था। यह चरित्र इतना लोकप्रिय था कि 1988 में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की 150 वीं वर्षगांठ पर भारतीय डाक सेवा द्वारा जारी एक स्मारक डाक टिकट में भी उन्हें चित्रित किया गया। उन्हें 1984 में श्रेणी के पत्रकारिता, साहित्य और क्रिएटिव कम्युनिकेशन आर्ट्स (जेएलसीसीए) में द रमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2005 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, भारत का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान